
उत्तराखंड निर्माण में यूकेडी के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता
लाखवान
उत्तराखंड राज्य के निर्माण की ऐतिहासिक यात्रा में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) की भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकता। अलग राज्य की मांग को जन-जन तक पहुंचाने, जनआंदोलन को दिशा देने और सत्ता के सामने मजबूती से आवाज उठाने का कार्य यूकेडी ने सबसे पहले और सबसे लंबे समय तक किया।
1979 में गठित यूकेडी ने पर्वतीय क्षेत्र की उपेक्षा, पलायन, बेरोजगारी और संसाधनों के शोषण के खिलाफ संघर्ष की नींव रखी। जब अलग राज्य की मांग मुख्यधारा की राजनीति में स्थान नहीं पा रही थी, तब यूकेडी ने सड़कों से लेकर सदन तक उत्तराखंड की आवाज बुलंद की। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जेल यात्राएं कीं, लाठियां खाईं और कई ने अपने जीवन का बलिदान तक दिया। मास्टर दीपक लाखवान ने कहा की
1994 के ऐतिहासिक आंदोलन में यूकेडी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की अग्रणी भूमिका रही। खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा जैसी घटनाओं में आंदोलनकारियों पर हुए अत्याचारों को आज भी उत्तराखंड का जनमानस भूल नहीं पाया है। इन संघर्षों ने अंततः केंद्र सरकार को अलग राज्य के गठन के लिए मजबूर किया।
9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ, लेकिन दुर्भाग्यवश राज्य बनने के बाद यूकेडी को वह राजनीतिक सम्मान और स्थान नहीं मिल पाया, जिसकी वह हकदार थी। इसके बावजूद यूकेडी आज भी मूल राज्य आंदोलनकारी विचारधारा, स्थायी राजधानी गैरसैंण, सशक्त भू-कानून और पहाड़ के हितों की रक्षा जैसे मुद्दों को उठाती रही है।
उत्तराखंड के इतिहास में यूकेडी केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक आंदोलन और जनभावना का प्रतीक रही है। राज्य निर्माण में उसके बलिदान और योगदान को याद रखना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।
